डर का इलाज – इन बातों के लिए हमेशा फ़िक्रमंद रहती हैं महिलायें

लगभग हर एक महिला को एक अज्ञात डर हमेशा रहता है. खासकर पुरुषों के मामले में महिलाएँ अक्सर असुरक्षित महसूस करती हैं. कई तरह के डर से अंदर ही अंदर जूझती रहती हैं. महिलाओं के अंदर इस तरह के डर का होना भी स्वाभाविक है. शादी के बाद पत्नी के रूप में एक अंजान व्यक्ति के हवाले खुद को सौंप देना. एक अजनबी को जीवन साथी के रूप में स्वीकार करना. एक अनजाने परिवार में खुद को संस्कारी और आदर्शवादी सिद्ध करने का डर. पति चाहे जैसा भी हो, उसके साथ खुद को एडजस्ट करने का डर. एक बहु के रूप में अनजाने सदस्यों के बीच खुद को व्यहवहार कुशल सिद्ध करने का डर. ऐसी ही कुछ बातों का डर महिलाओं को हमेशा सताता रहता है.

रिजेक्शन का डर

डर का इलाज

महिलाओं में रिजेक्शन का बहुत गहरा डर रहता है. उन्हें लगता है कि यदि वह खूबसूरत नहीं दिखेंगी तो उन्हें कोई भी पसंद नहीं करेगा. शादी के बाद भी महिला के मन में यह डर रहता है कि कुछ वर्ष गुज़र जाने के बाद उसका पति उसे चाहेगा या नहीं. कहीं उसके पति का उससे मन भर गया तब क्या होगा ? प्रेगनेंसी, उसके बाद डिलीवरी, फिर मोटापा. उसके बाद तो वह भद्दी दिखने लगेगी. क्या उसका पति उसकी तरफ आकर्षित रहेगा ? कहीं वह उसे नापसंद तो नहीं करने लगेगा ! अगर पति ने मुँह मोड़ लिया तब क्या होगा ? पति का रूखा व्यवहार देखकर ससुराल के लोग भी उससे नफरत करने लगेगें. कहीं ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया तो मायके में भी रहना मुश्किल होगा, क्योंकि शादी के बाद बेटियाँ मायके में रहने लगे तो लोगों के ताने कैसे बर्दाश्त कर पाएंगी !

स्वास्थ्य बिगड़ने का डर

डर का इलाज

महिलायें स्वास्थ्य को लेकर हमेशा गंभीर रहती हैं. उन्हें इस बात की फिक्र हमेशा बनी रहती है कि  उनके घर में किसी की सेहत ना बिगड़ जाए. अपने परिवार की सेहत को लेकर वे हमेशा फिक्रमंद रहती हैं. बढ़ते प्रदूषण और हिंसा को लेकर इस तरह की चिंता का होना स्वाभाविक भी है.

आत्म सम्मान का डर

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महिलाओं में अपने आत्म सम्मान को लेकर हमेशा एक भय होता है. हमारे समाज की दकियानूसी सोच महिलाओं के प्रति जो विचार रखती है, उससे लगभग सभी महिलायें प्रभावित रहती हैं. पुरुष प्रधान वाले समाज में महिलाओं का कब मज़ाक उड़ा दिया जाए, उनपर कब क्या आरोप लगा दिया जाए, इसका कोई भरोसा नहीं होता.

जिंदगी में अकेलेपन का डर

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महिलायें जिस घर में जन्म लेती हैं, वह उनका मायका कहलाता है. शादी के बाद जिस घर में जाती है, वह घर उनका ससुराल कहलाता है. अब कोई बताएगा कि उनका घर कहाँ है ? ससुराल वाले परेशान करेंगे तो मायके जाएगी. मायके वालों का प्रवचन होता है कि ‘जिस घर में डोली जाती है, उसी घर से अर्थी उठनी चाहिए’. समाज की इस नीति की वजह से महिलाओं में अकेलेपन का खौफ हमेशा रहता है.

विश्वास खोने का डर

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शादी से पहले मायके वालों को यकीन दिलाते रहो कि जिस लड़के से वह बात कर रही थी वह सिर्फ उसके साथ पढता है, इससे ज़्यादा और कुछ नहीं हैं उन के बीच. क्योंकि पेरेंट्स के ज़रा से शक होने का मतलब है फ्रीडम से आज़ादी. शादी के बाद ससुराल वालों की छोटी – छोटी  भावनाओं का ख्याल रखना. नहीं तो बात का बतंगड़ बनने में वक्त नहीं लगेगा और अपने ही घर में शक के दायरे में ज़िंदगी गुज़ारनी पड़ सकती है. इसलिए महिलायें इस तरह की परिस्थितियों से हमेशा डरी रहती हैं.

डर को डराएं

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इस तरह के डर को डराना होगा… इस तरह के फिक्र से परेशानियां बढ़ती हैं. जिस फिक्र या चिंतन से वर्तमान बिगड़ जाए, त्याग दे फ़िजूल के ऐसे परवाह को. महिलाओं को चाहिए कि वो हमेशा याद रखें कि यह इक्कीसवी शताब्दी है. गया वो ज़माना जब उन्हें पुरुषों पर आश्रित रहना पड़ता था. आज की महिलायें हमेशा इस सच्चाई को याद रखें कि वह आज की महिलायें हैं. आज की महिला अबला नारी नहीं बल्कि एक आत्म निर्भर और काम-काजी महिला है. इस सच को स्वीकार कर लें कि वर्तमान समय में महिलाओं की स्थिति में काफी बदलाव आए हैं. इसलिए पुरुष-प्रधान मानसिकता से पीड़ित न होकर, अपनी शक्ति को पहचानें और अपने अंदर बैठे डर को डराएँ.

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