डेटिंग क्या है ?

डेट पर क्या होता है

डेटिंग शब्द सुनते ही कुछ रोमैंटिक या सेक्सुअल टाइप की फीलिंग आने लगती है. है न! क्योंकि डेटिंग का मतलब ही रोमांस करना या शारीरिक सम्बन्ध बनाने जैसा कुछ होता है. नए-नए पार्टनर मिलते हैं. इसके लिए आपको सिर्फ करना इतना होता है कि किसी डेटिंग साइट पर खुद को रजिस्टर करना होता हैं. आपको एक ऑनलाइन फॉर्म भरना होता हैं, जिसमे आपको अपने विषय में, या पसंद की कुछ बातें बतानी होती हैं, जैसे डेट ऑफ़ बर्थ, मेल या फीमेल, किस टाइप के फ्रेंड आपको चाहिए, किस ऐज ग्रुप के पार्टनर चाहिए, या आपकी लोकेशन  इत्यादि कुछ इसी तरह के डीटेल्स आपको डालने होते हैं.

लगभग सभी डेटिंग साइट्स में दो तरह के रजिस्ट्रेशन कैटेगरीज होती हैं, एक फ्री और दूसरी पेड सर्विस. आपकी रजिस्ट्रेशन फ्री कैटेगरीज में है तो शायद ही आपका कभी नंबर आएगा. अगर आप फीमेल हैं तो भौरें ढूंढ ही लेंगे, पर अगर खुद भौरें हैं तो फूल तो आने से रहें क्योंकि डेटिंग साइट पर मेल कैंडिडेट्स की संख्या फीमेल कैंडिडेट्स की अपेक्षा बहुत अधिक होती है इसलिए इसके पेड मेंबर्स ही इतने अधिक होते हैं कि फीमेल कैंडिडेट्स की डाटाबेस उन्हीं तक सीमित रह जाती हैं क्योंकि पेड मेंबर्स को स्पेशल सुविधा दी जाती हैं. पेड कैटेगरीज से बचे हुए डाटाबेस फ्री वाले कैंडिडेट्स को दिखाए जाते हैं.

कुछ डेटिंग साइट्स हैं जहाँ सिर्फ फ्री कैटेगरीज होती हैं. जहाँ पार्टनर का मिलना मुश्किल तो नहीं होता लेकिन अच्छे क्वालिटी वाले मेम्बर्स बहुत कम मिलेंगे. इसलिए ऐसे साइट्स पर कुछ सतर्क रहने की जरूरत है.

चलिए ये तो रही बातें जो सामान्यतः डेटिंग साइट्स पर चल रहे हैं. डेटिंग कांसेप्ट को लेकर जो हमारी मानसिकताएं हैं, सिर्फ उन्हीं को दर्शायी गई हैं. वही बातें ऊपर दी गई हैं, जो आजकल इस कांसेप्ट को लेकर चल रही हैं.

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ये डेटिंग होती क्या है ?

वस्तुतः, डेटिंग उसे कहते हैं जब लड़का-लड़की आपस में मिलते हैं, एक-दूसरे को जानते हैं, दोनों एक-दूसरे को समझते हैं, परखते और फिर पसंद आने पर शादी के लिए प्रपोज़ करते हैं.

डेटिंग की प्रथा कब से चल रही हैं ?

डेटिंग की प्रथा पश्चिमी सभ्यता की देन हैं. वहां शादी से पहले लड़का-लड़की को एक-दूसरे से मिलने देने की पौराणिक प्रथा रही है. दोनों मिलकर एक-दूसरे को समझते हैं, उसके बाद पसंद आने पर शादी होती है. लेकिन ये प्रथा अभी कुछ वर्षों से हमारे समाज में भी फैलने लगी. जबकि हमारे यहाँ की प्रथा थी, माता-पिता या घर के बड़े बुजुर्ग लड़की के लिए योग्य वर ढूंढते थे, और शादी होती थी. लड़की या लड़का एक-दूसरे को शादी के बाद ही देख पाते थे या जान पाते थे. क्योंकि शादी के पहले उनके आपस में मिलने जैसी कोई प्रथा नहीं थी. शादी के पहले अगर लड़का या लड़की को देखना भी होता था, तो सिर्फ घर के लोग ही देखते थे.

भारत में डेटिंग प्रथा की शुरुआत कैसे हुई ?

समय के साथ पीढ़ी दर पीढ़ी, लोगों की सोंच बदलती गई. आज का इंसान इंटरनेट युग में जी रहा है. लेकिन आज की बातें हम बाद में करेंगे. पहले तो ये जानना जरूरी है कि डेटिंग की शुरुआत भारत में कैसे हुई? तो आपको याद दिला दें, इंटरनेट के आने से पहले भी शहरों के समाज में डेटिंग हुआ करती थी. कुछ लव अफेयर्स के माध्यम से, तो कुछ शादी के नाम पर. जो लव कपल्स हुआ करते थे, उनकी डेटिंग होती थी ये तो समझ में आता है. लेकिन जहाँ लव अफेयर्स नहीं हैं, वहां कैसे होती थी? तो आपको ध्यान दिला दूँ, ऐसी डेटिंग बिना लव अफेयर्स के, पहले भी होती थी. आज भी होती हैं.

शहरों क़े एडवांस घरों में शादी के पहले लड़का-लड़की एक दूसरे से मिलते थे और घर में ही मिलते थे. लड़के वाले अपने लड़का के साथ, शादी के लिए लड़की देखने आते थे. जहाँ घर वाले उन्हें एक-दूसरे के साथ कुछ देर बात करने की अनुमति देते थे. उन्हें इतने ही देर में निर्णय लेना होता था कि दोनों एक-दूसरे को पसंद हैं या नहीं. लड़का-लड़की की इसी मुलाक़ात को तो डेटिंग कहते हैं.

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इंडिया में ऑनलाइन डेटिंग की शुरुआत कैसे हुई ?

लोगों का गाँव से शहरों की तरफ बढ़ती हुई भीड़ की वजह से इंडिया में ऑनलाइन डेटिंग का चलन आया. पिछले कुछ दशकों से रोजगार की वजह से लोगों का शहरों में पलायन होता रहा है. इस वजह से लोग धीरे-धीरे अपने समाज से अलग होने लगें. कुछ वर्षों के बाद उनकी अगली पीढ़ी शादी के योग्य होने लगी, जो उनके लिए एक समस्या बनने लगी. चूंकि लोग अपने गाँव-समाज से बिखर चुके होते हैं, इसलिए शादी-विवाह के लिए रिश्तों का मिलना मुश्किल सा होने लगता हैं.

किसी के माध्यम से कुछ एक रिश्तों  के ऑफर आते भी तो उन पर विश्वास करना मुश्किल होता था. या जो कुछ आते भी थे, तो उनकी क्वालिटीज़ अच्छी नहीं होती थी. लोगों की इन्हीं परेशानियों को देखते हुए इंडिया में शुरू हुई इस तरह के कांसेप्ट. जो मैट्रिमोनियल साइट्स के नाम पर शुरू की गई. जहाँ लोगों को अपने-अपने रोजगार, शिक्षा, धर्म या जाति का पूरा विवरण देना होता हैं. धीरे-धीरे ये लिस्ट लम्बी होती गई और लोगों को घर बैठे-बैठे रिश्तों के लिए अपार संभावनाएं मिलने लगीं जो समय के साथ काफी प्रचलित भी होने लगी .

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डेटिंग को भारत में गलत क्यों समझा जाता हैं ?

हर डेवलपमेंट्स के कुछ साइड इफेक्ट्स होते हैं. बंदूक बनाई गई थी आत्म रक्षा के लिए, लेकिन लोग आत्म रक्षा के बजाय हत्या करने लग गए. ठीक वैसे ही डेटिंग कांसेप्ट की भी कुछ ऐसा ही हाल हो गया हैं . इस सुविधा को आज की पीढ़ी ने अपनी सहूलियत के हिसाब से मौज-मस्ती का ज़रिया बना लिया हैं. इस कांसेप्ट का मकसद कुछ और था, लेकिन मस्तीगिरी के चक्कर में डेटिंग अब सेक्सुअल कांसेप्ट बन गया. अधिकतर लोगों के लिए यह सुविधा अब कैज़ुअल सेक्स का एक माध्यम बन कर रह गया हैं.

डेटिंग साइट्स पर आपको लड़के-लड़कियों के अलावा शादी-शुदा लोग भी काफी संख्या में मिल जाएंगे. अधिकतर शादी-शुदा लोगों के डेटिंग साइट्स पर आने की वजह कैज़ुअल सेक्स और जीवन की नीरसता मिटाना हैं. ये एक ऐसा रोमांटिक प्लेस बनता जा रहा है जहां किसी अन्य व्यक्ति का डिस्टर्ब करने की गुंजाइश नहीं होती. इसी वजह से इसके मांग दिनों-दिन लगभग हर वर्ग के लोगों में बढ़ते जा रहे हैं.

 

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