मै अक्सर अपनी wife के लिए ‘पत्नी जी’ से सम्बोधन करता हूँ. चाहे लेखन हो या व्यावहारिक जिंदगी. मेरे कुछ एक लेखन में आप ने गौर भी किया होगा. जहाँ मेरी wife की चर्चा हुई है, वहां ‘पत्नी जी’ से मेरा सम्बोधन हुआ है. इसका मतलब ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि मैं दब्बू किस्म का, सो कॉल्ड ‘बीवी का ग़ुलाम’ हूँ. क्योंकि हमारे समाज की यही धारणा रही है कि जो लोग अपनी wife की सेवा करें. या उनका आदर करें. या फिर अपनी अर्धांगिनी के हर बात को मानें. वैसे लोगों के लिए सम्बोधन ‘बीवी का ग़ुलाम’ ही होता है.

चलिए जो जैसा सोचता है, उसकी सोंच उसे मुबारक हो. क्योंकि हर इंसान अपने विवेक का ग़ुलाम होता है. गलती किसी की भी नहीं है. समाज की भी नहीं.

मेरे इस व्यवहार से आप सोचते होंगे मैं एक आदर्श पति हूँ. है न! पर नहीं ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. मैं भी एक कॉमन पति हूँ.  अपनी वाइफ पर गुस्सा करता हूँ, दूसरी महिलाओं की तरफ आकर्षित भी होता हूँ. जीवन के हर रंगीनियां मुझे भी पसंद है. क्या करूँ पैदाइसी रोमांटिक हूँ. आप ये समझ लें रोमांटिक होना शायद मेरे ‘राशि दोष’ है. पर जो कुछ भी करता हूँ, मेरी पत्नी जी के जानकारी में होती है. क्योंकि जो कुछ भी करता हूँ अपने संस्कार और मान-मर्यादा के दायरे में.

जहाँ तक बात है पत्नी से प्रेम करने की, तो आप जितने पतियों से पूछेंगे कि ‘क्या वे अपनी wife से प्रेम करते हैं?’ तो आप देखना सभी का जवाब ‘हाँ’ होगा. पर जब आप पूछेंगे ‘क्या आप अपनी उनका का आदर करते हैं?’ तो मुझे लगता है कुछ लोग आपको दाए-बाएं झांकते नज़र आएंगे.

आपने सोचा है ऐसा क्यों है?

गलती उनकी बिल्कुल भी नहीं है, जो दाए-बाएं झाँकने लगते हैं.

या गलती उनकी बिल्कुल भी नहीं है जो लोग पत्नी को अपनी प्राइवेट प्रॉपर्टी समझते हैं.

गलती उनकी भी नहीं है जो लोग खुद को पति परमेश्वर होने का अधिकार रखते हैं.

गलती उनकी भी नहीं है जो लोग पत्नी को ‘वासना तृप्त करने के लिए एक दासी’ या ‘सेक्स स्लेव’ समझते हैं.

फिर गलती है कहाँ?

शायद हमारी एक तरफ़ा शिक्षा में.

हम अपने बहु-बेटियों को शिक्षा देते हैं. उन्हें संस्कार की दुहाई देते हैं. जैसे –

‘पतिव्रता वही है जो अपने सभी इच्छाओं को, पति की इच्छा के आधीन कर दें’

‘पति कैसा भी हो, उसकी सेवा करना ही हर महिला का धर्म होता है. क्योंकि पति की सेवा करने से बैकुंठ की प्राप्ति होती है.’

‘पति ही परमेश्वर है’ इत्यादि.

शिक्षा सचमुच अच्छी है. ये बातें पत्नियों को तो जरूर सीखने चाहिए.

पर पति को क्यों नहीं?

ये एकतरफा शिक्षा किसलिए?

बेटा गर्भ में नौ महीने रखने के बाद पैदा होता है. बेटी दो-चार महीने में ही गर्भ से बाहर निकल आती है क्या?

अगर पत्नी अपने पति को ‘पति देव’ से सम्बोधन कर सकती है, तो पति अपनी wife को ‘पत्नी देवी’ क्यों नहीं कह सकता ?

अपनी संस्कृति की दुहाई देने वाले लोग, एक और संस्कार को याद रखें. जहां स्त्री जाति का आदर-सम्मान नहीं होता और उनके प्रति तिरस्कारमय व्यवहार किया जाता है. वहां ईस्वर की भी कृपा नहीं रहती.

पति होने मात्र से कोई परमेश्वर नहीं बन जाता! पति वही परमेश्वर है. जो अपनी पत्नी की बुराई में, अपनी बुराई और उसकी बड़ाई में अपनी बड़ाई समझता है. पति वही योग्य है. जो अपनी पत्नी की सेवा लेता है तो पत्नी की सेवा भी करता है. मैंने तो अपनी बात रख दी. बाकी तो राम ही राखे…

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