भूलना ज़रूरी है उनको, जिनकी यादें दुखदायी हो

कुछ यादें ऐसी होती हैं जिन्हें भूलना मुश्किल होता है. कोई साथी ऐसा होता है जिसे भूलना नामुमकिन सा लगता है. जिन यादों को जितना अधिक भूलना चाहते हैं उतना ही ज़्यादा हमारा मन-मष्तिष्क उन्ही यादों में उलझा रहता है. गुज़रे हुए लम्हें दिल को सताते रहते हैं. बीते हुए दिन मष्तिष्क के परदे पर वर्तमान की तरह दिखने लगते हैं, नींदे उड़ जाती हैं. यादों को भूलना तो बहुत दूर की बात है, भावनाएं मचल उठती हैं जब प्यारे-प्यारे लम्हें आँखों में बसने लगते हैं.

यादों में जब तक उनका एहसास रहता है सबकुछ अच्छा लगता है. उनके साथ गुज़रे हुए एक-एक पल गुदगुदाते रहते हैं. जी चाहता है बंद आँखों से उन लम्हों को गुज़रते हुए देखते रहें… और कुछ नहीं… बस उनके एहसास को महसूस करते रहें… लेकिन वर्तमान में लौटते ही कड़वे सच का सामना होता है कि अब वो पल फिर नहीं लौट सकते. गुज़रे हुए वो दिन ज़िन्दगी नहीं लौटाने वाली अब किसी भी हाल में, ऐसा सोच कर दिल काँप उठता है… आँखें भर आती हैं… ऐसा लगता है मानो लोगों से भरी इस दुनिया में बिलकुल अकेला रह गए हों.

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ज़िन्दगी का खौफनाक रूप

ज़िन्दगी तो बस ज़िन्दगी है… निर्मोही और निर्दयी… ख्वाब कुछ दिखाती है… हक़ीक़त से सामना किसी और ही रूप में कराती है. ऐसे-ऐसे मंज़र सामने आते रहते हैं जिनकी हमें कभी कल्पना भी नहीं होती… अचानक ज़िन्दगी का खौफनाक रूप एक तूफ़ान बनके सामने आता है और पल भर में विनाश करके गायब हो जाता है, पल भर का यह विनाशक रूप भूले नहीं भुलाया जाता और वे लम्हे एक डरावना सपना बनके ज़िन्दगी भर डराते रहते हैं और मज़बूरन हम डरे-सहमे उन भयानक मंज़रों में खुद को डुबोते जाते हैं. रोते रह जाते हैं. तड़पते रह जाते हैं… उस विनाशक दृश्य और जानलेवा लम्हे को याद करके जलते रह जाते हैं हम… एक दिन ऐसा वक्त भी आ जाता है जब ज़िन्दगी हमारी सिसकती हुई आत्मा पर रहम कर देती है और आज़ाद कर देती है इस बीमार देह से.

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कुछ कहती है ज़िन्दगी

सच कहे तो हम साँसे ज़रूर लेते हैं जीने के लिए पर अफ़सोस जी नहीं पाते. साँसे चलना ही ज़िन्दगी की निशानी नहीं है. ज़िन्दगी कहती है मुझसे प्यार करके देखो. मुझे जियो क्योंकि मैं ही ज़िन्दगी हूँ… मैं ही सुख हूँ… मैं ही दुःख हूँ… अँधेरा भी मैं और उजाला भी मैं… खुशबू भी मैं… बदबू भी मैं… मैं ही हँसती हूँ और मैं ही तो रोती हूँ… बर्बादी भी मैं हूँ… आबादी भी मैं हूँ… चुन लो तुम्हे जो चाहिए… लूट लो सब तुम्हारा ही है. तुम्हारे लिए ही तो हूँ मैं ! तुम ही तो मैं हैं और मैं ही तो तुम हो… लेलो तुम्हे जो चाहिए…

ज़िन्दगी की सूरत

जिस ज़िन्दगी को हम बेवफा, बदसूरत, डरावनी और पता नहीं कैसे-कैसे शब्दों से अपमानित करते रहते हैं, सच मानिये तो बहुत प्यार करती है वो ज़िंदगी हमसे. सचमुच बहुत प्यार करती है हमें हमारी ज़िन्दगी. हो सकता है आप मेरी इस बात से सहमत ना हों… हो सकता है ज़िन्दगी की तारीफें आपको पसंद ना आ रही हों. ऐसी बातें आपको बकवास भी लग रही होंगी क्योंकि हो सकता है ज़िन्दगी अपना भयानक रूप ही आपको दिखाती रही हो… गलती आपकी नहीं है अगर ज़िन्दगी ने सिर्फ कड़वाहटें ही पिलाई है आपको. आपके लिए बहुत मुश्किल है यह स्वीकार कर लेना कि ज़िन्दगी बहुत खूबसूरत है… एक खुशबूदार बगीचा है… इस ज़िन्दगी में आनंद ही आनंद हैं… बहार है ज़िन्दगी…

ज़िन्दगी वैसी है जैसे हम हैं

सच मानिये तो ज़िन्दगी ठीक वैसी है जैसे हम हैं… ज़िन्दगी महज़ पानी है, रंग तो हम डालते हैं… लाल डाला तो लाल रंग, हरा डाला तो हरियाली ज़िन्दगी और काला डाला तो काली ज़िन्दगी. इस पानी रूपी ज़िन्दगी के बहाव में बहते रहना ही ज़िन्दगी है. अगर बहते रहें तो किनारा मिल जाएगा. लेकिन ज़रा सोचिये हम क्या करते हैं ! संसार रूपी नदी में पानी बनकर बहते रहते हैं… अपनी मस्ती में भागते रहते हैं… अचानक कोई चट्टान सामने आती है और हम टकरा जाते हैं… बहुत चोट लगती है… आत्मा ज़ख्मी हो जाती है… हम फिर बहने लगते हैं… बहते-बहते उस पत्थर की चोट और उस पत्थर से बहुत दूर निकल आते हैं लेकिन उस चोट को भूले नहीं भूलना चाहते… उसके एहसास को पाले रखते हैं…

ना जाने वह चट्टान कितनी पीछे रह गयी… ना जाने कितने आगे निकल आये हम उस चट्टान से. फिर भी वह चट्टान और चट्टान की चोट हमारे दिल के करीब होती हैं क्योकि हमने दिल में बसा रखा है उन्हें. उस पत्थर से दूर निकलने के बाद कितने ही खुशबूदार फूल मिले थे, लेकिन हमने देखा ही कहाँ क्योंकि आँखों में तो उस पत्थर को बसा रखा था हमने जिसने हमे ज़ख़्मी किया. हमारा मन-मष्तिष्क उस पत्थर की चोट के ख्यालों में इस कदर व्यस्त होता है कि उन्हें चोट के सिवा कुछ नज़र नहीं आता. ज़ाहिर है ज़िन्दगी पत्थर के रूप में ही नज़र आएगी.

भूलना ज़रूरी है

जो बातें हमें पीड़ा दे, उसे भुला देना ही बुद्धिमानी है. हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि बुद्धिमान लोग एक अच्छी ज़िन्दगी जीते हैं. समझदार लोग हमेशा अपनी ज़िन्दगी की आगोश में सिर्फ सुख-चैन ढूंढते हैं. जो चोट लगी उस चोट को भूलना ही खुशहाली की शुरुआत है. जिन लम्हों में दर्द मिला उन दर्दनाक पलों को भूलना ही बुद्धिमानी है. दुःख के लम्हें जब थे तब थे, लेकिन इनके गुज़र जाने के बाद इन्हें भूलना ही ज़िन्दगी है. एक ही दुखदायी बिंदु पर ध्यान केंद्रित किये रखना शायद बुद्धिमानी तो बिल्कुल भी नहीं है. हैं न !

हम जो ढूंढेंगे वही मिलेगा

सच है… बिल्कुल सच कि हम जो ढूंढेंगे हमें वही तो मिलेगा. सुख ढूंढो तो सुख है, दुःख ढूंढो तो दुःख, हंसी ढूंढो तो हंसी लबों पर और आंसू ढूंढो तो आंसू ही आंसू… ये हम पर निर्भर करता है कि हमें क्या चाहिए.

भूलना मुश्किल है

जहाँ उनके बगैर एक पल भी गुज़ारना मुश्किल होता था, तो उनके बगैर ज़िन्दगी जीनी पड़े, यह सोचकर ही रूह काँप उठती है. जिसके बगैर कभी ज़िन्दगी की कल्पना भी न की हो ऐसे में उनको भुलाकर जीवन गुज़ारना एक पीड़ादायी एहसास लगता है. जिसके साथ हमने एक युग गुज़ारा होता है अचानक जब उसके बिना जीना पड़े तो ज़िन्दगी बेरंग लगने लगती है… बदसूरत लगने लगती है… भयानक लगने लगती है… रही बात उनको भुलाने की तो भूलना आसान तो बिल्कुल भी नहीं लगता पर भूलना होगा… जी बिल्कुल… भूलना ही होगा… भूलना मुश्किल है पर मुमकिन है… बिल्कुल मुमकिन है… सच को स्वीकारना होगा कि अब वह आपके साथ नहीं रहे…

हर इंसान अकेला होता है

भूलना या भुला पाना मुश्किल इसलिए लगता है क्योंकि एक सच से हम मुँह मोड़ते रहते हैं. वही सच जो बिल्कुल सच है… सच है कि दुनिया में हम अकेला आए हैं… सच है कि दुनिया से हम अकेले ही जाते हैं… जब हमारा आना और जाना दोनों ही अकेले होना है तो इस अकेलेपन में जीने से क्यों घबराते रहते हैं हम… क्यों किसी का साथ छूटते ही ज़िन्दगी ख़त्म हो जाने की कल्पना करने लग जाते हैं हम… जो मिले वही साथी ऐसी नियति को स्वीकार करना ही ज़िन्दगी है… विश्वास कीजिये यही जीवन है.

साथी का साथ

इस संसार में परमानेंट कुछ भी नहीं होता, सब टेम्पररी हैं. जब हम जिंदगी से परमानेंट होने की उम्मीद नहीं कर सकते तो किसी के साथ की कल्पना उम्र भर के लिए कैसे कर सकते हैं… जो संभव नहीं है, उस असंभव को हम सच मान बैठते हैं जो हमे सिर्फ दुःख और पीड़ा देता है. ध्यान रखिये कि जब ज़िन्दगी का कोई भरोसा नहीं है, ऐसे में किसी और का उम्र भर साथ निभाने का भरोसा करना खुद से किया गया एक धोखा है. साथी का साथ कब तक रहेगा यह न साथी पर निर्भर करता है और ना ही हम पर… यह तो सिर्फ नियति पर निर्भर करता है कि कौन किसके हिस्से कब तक है.

भूलने के लिए ध्यान कही और लगाएँ

हम इंसानों की सबसे बड़ी कमी है कि हमें बहुत जल्दी किसी की आदत लग जाती है. जो हमारे साथ होता है उसके साथ की लत पड़ जाती है. ऐसी स्थिति में अपनी आदत को त्यागना मुश्किल लगता है और कभी-कभी तो असंभव, लेकिन भूलना तो होगा ही क्योंकि उनका साथ अब नहीं रहा… भूलने का सबसे बेहतर तरीका है अपना ध्यान कहीं और लगाना… खुद को वहाँ व्यस्त रखना जहाँ हमें अच्छा लगता हो.

अपने पसंद की कोई किताब पढ़ें या कोई पसंदीदा ब्लॉग पढ़ें. फ़िल्में देखें या लोगों से मिलना-जुलना करें और उनसे दोस्ती करें. इससे आपका ध्यान दूसरी तरफ आकर्षित होगा और इस आकर्षण में एक नए साथी का आगमन होगा… जब नए साथी का आगमन होगा तो बिछड़े हुए साथी को भूलना बेहद आसान हो जाएगा… गुज़रे हुए पलों के एहसासों को भूलना आसान हो जाएगा… ज़िन्दगी फिर से चल पड़ेगी एक नयी उमंग और एक नए जोश के साथ… ऐसा करके देखिये बहुत मज़ा आएगा… करके तो देखिये…

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उनकी फिक्र करें जिन्हें आपकी फिक्र है

किसी एक के लिए खुद से नाराज़ हो जाना. किसी एक के लिए खुद को बर्बाद कर लेना या खुद को ख़त्म कर लेना उनके साथ गद्दारी होगी जिन्हें हमारी फिक्र है. खुद की फिक्र नहीं कर सकते तो कम से कम उनकी फिक्र तो करनी होगी जिन्हें हमारी फिक्र है. क्या हमारी ज़िन्दगी सिर्फ एक के लिए थी जिनके जाने के बाद हमने खुद को ख़त्म कर लेने का मन बना लिया है ! उनकी भावनाओं का कोई मोल नहीं जिनके हम अपने हैं ! इतना स्वार्थी कोई कैसे हो सकता है कि खुद की भावनाओं में ऐसे डूब जाए कि दूसरों की भावनाओं की परवाह ही ना हो… ये कितना उचित होगा कि एक को नहीं भुला सकते उसके लिए सभी को भूल जाना ! भूलना उनको है जो अब नहीं हैं, ना कि उन्हें भूलना है जो हमारे साथ हैं.

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भूलने की चाहत

गुज़रे दिनों को भुलाने के लिए भूलने की चाहत का होना बेहद ज़रूरी है. जब तक चाह नहीं होगी राह नहीं मिलेगी, इसलिए भूलने की चाहत बहुत ज़रूरी है. भूलने के लिए खुद को उन लोगों में व्यस्त कर लें जिनके बीच आपको ख़ुशी मिले… ध्यान रखें कि हम ज़िन्दगी को प्यार करेंगे, तभी ज़िन्दगी हमें प्यार देगी… ज़िन्दगी का प्यार पाने के लिए उन बातों को भूल जाएँ जिनसे आपको पीड़ा होती है.

खुशहाल भविष्य के लिए भूल जाएँ उन लम्हों को जो कभी लौट के नहीं आने वाले. आपको भूलना ही होगा… अपने लिए ना सही अपनों के लिए ही सही लेकिन भूलना होगा… वर्तमान की खुशियों के लिए भूलना होगा… सुनहरे भविष्य के लिए भूलना होगा… आपके अपनों की खातिर भूलना होगा… भूलना होगा उस ज़िंदगी को जो गुज़र चुकी है… उस साथी को भूलना होगा जो लौट कर नहीं आने वाले अब. विश्वास कीजिये… भूलना ज़रूरी है उनको, जिनकी यादें दुखदायी हो.

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