लड़का लड़की एक समान Ladka Ladki Ek Saman

इस आधुनिक युग में भी अगर यह बताना पड़े कि लड़का लड़की एक समान हैं, तो ये शर्म की बात है. ‘लड़का लड़की एक समान’ जैसे विषय पर लिखना भी सचमुच दुःख की बात है. इंसान दो लिंगों में बाँटे गए थे सांसारिक ज़रूरतों को पूरी करने के लिए. इन दोनों लिंगों में प्रकृति ने एक भेद रखा था और हमने इस भेद को भेदभाव में बदल दिया.

इंसान बना था धरती पर चलने फिरने के लिए, लेकिन हम पंछियों की तरह हवा में उड़ने लगे. हवा में उड़ने की वजह है हमारी मानसिक तरक्की, हम एक डब्बे के ज़रिये ही हवा में बातें करने लगे हैं. हवा में उड़ने या बातें करने की वजह है हमारी वैज्ञानिक तरक्की. हवा में उड़ाने वाली हमारी बेटियाँ भी हैं. हवा में बातें कराने वाली हमारी बेटियाँ भी हैं. फिर भी कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें समझाना पड़ता है कि लड़का लड़की एक समान हैं.

भेदभाव की एक घटना

हरियाणा में रोहतक के एक गाँव की घटना है. कुछ वर्षों पहले यह बात काफी सुर्ख़ियों में आयी थी. इस गाँव में एक Co-education स्कूल है. Co-education के अनुसार लड़के लड़कियाँ साथ पढ़ते चाहिए. लेकिन यह school Co-education सिर्फ कहने को था या कागज़ों में ही था. इस स्कूल के बीचों बीच एक दीवार बना दी गयी थी. लड़के लड़कियों की क्लासेज़ अलग-अलग कर दी गयी थी. शिक्षकों का भी बटवारा कर दिया गया था. ऐसा करने के पीछे गाँव वालों का तर्क था कि लड़का लड़की दोनों ही पढ़ें पर अलग अलग. क्योंकि वे साथ पढ़ेंगे तो उनके बीच नज़दीकियाँ आएंगी. नज़दीकियाँ आएंगी तो उनमें प्यार होगा. प्यार होगा तो वे एक-दूसरे से शादी करना चाहेंगे. उनकी शादी नहीं की जाएगी तो वे घर से भाग जाएंगे.

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ऐसे लोग आज भी इस मानसिकता में जी रहे हैं कि लड़का लड़की एक समान नहीं हो सकते हैं. इन्हें लगता है कि बेटियाँ अकेली न कही जा सकती है, न ही कहीं घूम फिर सकती हैं.

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बेटियाँ पराया धन होती हैं

आज भी हमारा समाज लड़का लड़की में भेदभाव रखता है. ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो मानते हैं कि बेटियाँ पराया धन होती हैं. उन्हें कितना भी पढ़ा-लिखा दो, करना तो उन्हें चूल्हा चौकी ही है. इसलिए लड़का लड़की की शिक्षा में भी भेद भाव किया जाता है. लड़का लड़की के खानपान में भेदभाव किया जाता है. लड़के को पढ़ लिख कर बड़ा आदमी बनना है; लड़कियों को ससुराल वालों की सेवा करनी है, रसोई में चूल्हा चौकी करनी है, पति और सास की सेवा करनी है.

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इसलिए लड़कियों को बचपन से ही इन सब कामों की ट्रेनिंग दी जाती है. उन्हें एक बढ़िया रसोइया बनाया जाता है. उन्हें अच्छी मालिश करना सिखाया जाता है जबकि ऐसी मानसिकता वाले लोगों को बेटियों का और भी ज़्यादा ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि बेटियाँ पराया धन होती हैं तो उन्हें बेटियों का और भी विशेष ख्याल रखना चाहिए. कम से कम यही सोच के कि बेटियाँ कुछ वर्षों की ही मेहमान हैं उनके घर में. बेटियाँ पराये घर चली जाएंगी तो उन्हें कोई कष्ट न हो. इसलिए बेटियों को आत्म निर्भर बनाना चाहिए.

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शिक्षा का अभाव

लोगो में लड़का लड़की में भेदभाव रखने की एक वजह शिक्षा का अभाव भी है. आज के आधुनिक युग में भी लड़का लड़की में फर्क रखने वाले लोग अशिक्षित ही होते हैं. ऐसी मानसिकता की बड़ी वजह महिलाओं की अशिक्षा है. एक माँ भी किसी की बेटी थी, और उस बेटी को उचित शिक्षा न मिल सकी. उसकी यही अशिक्षा आज भी बेटियों के लिए नुकसानदायी साबित होती है जिन्हें शिक्षा मिली भी है तो सिर्फ किताबी ज्ञान ही मिली हैं. उन्हें मानसिक शिक्षा नहीं मिल सकी. यही वजह है कि वे विज्ञान पर नहीं बल्कि पौराणिक उपचार पर विश्वास रखती हैं. उन्हें वैज्ञानिक उपचार पर नहीं बल्कि ओझा गुणी, झाड़ फूँक पर अधिक भरोसा होता है.

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ऐसी मानसिकता की महिलायें सिर्फ गाँव देहात में ही नहीं, बल्कि शहरों में भी हैं. आज भी कई घरों में किसी के बीमार पड़ने पर जंतर मंतर, झाड़ फूँक से रोगों का उपचार करने की कोशिश की जाती हैं. ऐसी महिलाओं से क्या उम्मीदें की जा सकती हैं ? वे लड़का लड़की में भेदभाव रखती हैं तो इसकी वजह अशिक्षा ही है.

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लड़का लड़की में भेदभाव एक मानसिकता है

आज लड़कियाँ घर से बाहर निकल रही हैं, वे हर मामले में अपनी पहचान बना रही हैं. ‘लड़का लड़की एक समान’ की भावनाओं से साथ मिलकर काम कर रही हैं. पर क्या जैसा दिख रहा है, वैसा ही है ? क्या समाज बदलने लगा है ? क्या हमारी सोच में बदलाव आने लगे हैं ? पीढ़ी दर पीढ़ी लड़का लड़की में भेदभाव आगे बढ़ता गया. होश संभालते ही लड़का लड़की में भेदभाव हम देखते आये हैं. लड़का लड़की के बीच किया जाने वाला यह भेदभाव हमारी मानस्किता बन चुका है. बचपन से देखते आये है कि लड़कों को रोते देख कहा जाता था क्यों लड़कियों की तरह रो रहे हो. कोई दुबला पतला होता था तो लड़कियों की तरह दिख रहे हो.

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क्या रोना सिर्फ लड़कियों को ही चाहिए ? क्या दुबली, पतली या कमजोर सिर्फ लड़कियाँ ही होती हैं ? ऐसी मानसिकताओं से घिरा ये समाज क्या दिल से स्वीकार कर पाएगा लड़का लड़की को एक समान ? क्या ‘लड़का लड़की एक समान’ की सोच हम पर हावी हो सकेगी ? क्या ‘लड़का लड़की एक समान’ की सोच हमारी मानसिकताओं को बदल पाएगी ? लड़कियों को हमने घर से बाहर निकलने की अनुमति तो दे दी, लेकिन क्या हमारी मानसिकताएँ इसे स्वीकार कर पा रही हैं ? क्या ‘लड़का लड़की एक समान’ जैसी भावनाओं के हम आदी हो चुके हैं? अगर ऐसा है तो कौन हैं वे लोग जो लड़कियों को देखते ही मचल जाते हैं ?

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मानसिक बदलाव

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इन सभी सवालों का एक ही जवाब है – मानसिक बदलाव. हमें लड़कियों को आत्म निर्भर होना सिखा दिया, यह एक अच्छा बदलाव है. बदलाव होना अच्छी बात है; असल में मानसिक बदलाव की सख्त ज़रूरत है हमें. ‘लड़का लड़की एक समान’ की सोच को जड़ से मजबूत करना  ज़रूरी है. इस सोच के लिए पुराने विचारों को निकाल फेंकना होगा. हमें अपने विचार बदलने होंगे. समाज के हर सदस्य को अपनी मानसिकता बदलनी होगी.

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असुरक्षा की भावना

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दरअसल हमारे समाज में लड़का लड़की एक समान नहीं समझने के पीछे एक बड़ी वजह और भी है. लड़के को लेकर कभी किसी को असुरक्षा की भावना नहीं होती. लड़का लड़की की शादी की बात करें तो किसी को लड़के की शादी की फिक्र नहीं होती. लड़के की शादी के लिए तिलक दहेज़ की भी चिंता नहीं होती.  लड़का बड़ा होकर बुढ़ापे का सहारा बनेगा. लड़कियाँ तो ससुराल चली जाएंगी, यही सोच है जिस वजह से लड़का लड़की को एक समान नहीं समझा जाता. लड़का लड़की के भेदभावों को छोटी छोटी बातों में भी महसूस किया जाता है.

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शिक्षा में भेदभाव

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लड़का लड़की के भेदभाव की शुरुआत बचपन से ही शुरू हो जाती है. लड़के को पेशाब करनी हो तो कहीं भी करने की छूट रहती है. लेकिन लड़की को पेशाब करने के लिए बाथरूम में ले जाया जाता है. लोग बचपन से ही लड़के को बदमाश, जानवर या शैतान की संज्ञा देने लगते हैं. और उसे सुधारने की कोशिश भी नहीं करते क्योंकि वह लड़का है. ‘मर्द जात होते ही बिगड़ैल हैं’ की मानसिकता से लड़कों को छूट मिल जाती है.  लड़कियों को अच्छे संस्कार, उठना-बैठना, बातचीत करने के तौर तरीके सिखाते हैं. लड़कियों को सहनशील होना सिखाया जाता है. लड़कियों को संस्कार और संस्कृति का पाठ पढ़ाया जाता है. इनमें से शायद ही कोई बात हो जो लड़को को सिखाई जाती हो.

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लड़का लड़की की परवरिश में भेदभाव

लड़का लड़की की परवरिश से ही भेदभाव की शुरुआत होने लगती है. लड़कियों को सिखाया जाता है कि वे लड़कों से अपनी तुलना न किया करें. लगभग हर समाज में लड़कियों की परवरिश ऐसे ही की जाती है. हम भूल जाते हैं कि बच्चे हमारी संतान हैं. लड़का लड़की होना सिर्फ उनका लैंगिक फर्क है. इस संसार को चलाने के लिए लड़का लड़की दोनों लिंगों का होना ज़रूरी है. दोनों ही इंसान हैं. दोनों ही हमारी संतान हैं. फिर लड़का लड़की में यह कैसा भेदभाव. लड़का लड़की की शिक्षा में यह अंतर क्यों?

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संस्कार की ज़रूरत जितनी लड़कियों को है, उतनी ही लड़को की भी है.  उठने बैठने के तरीकों के ज्ञान लड़कियों के अलावा लड़को को भी मिलना चाहिए. खुले में पेशाब करने की अनुमति लड़को को भी नहीं होनी  चाहिए. लड़का लड़की के लिंगों में भेद हैं. इस लिंग के भेद को भेदभाव बनाकर हम एक स्वस्थ समाज की कल्पना नहीं कर सकते. ऐसे में ‘लड़का लड़की एक समान’ कहना तो खुद को ठगने जैसा ही होगा.

 

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