सेक्स एजुकेशन क्यों जरूरी है ? Sex Education in Hindi

हमारे यहाँ 21वीं सदी में भी सेक्स एजुकेशन एक पहेली है. हमारे समाज में सेक्स शब्द पूर्ण रूप से निषेध है. इस अहम् विषय को गोपनीय रखा जाता है. इस विषय पर खुलकर कुछ कहना भी आपत्तिजनक माना जाता है. इस परिस्थिति में सेक्स एजुकेशन की बातें करना या इसकी उम्मीद करना बहुत दूर की बात है. जिस समाज में सेक्स के टॉपिक पर बात करने में आज भी लोग हकलाते हैं, वैसे समाज में सेक्स एजुकेशन को बढ़ावा देना बहुत बड़ी चुनौती है.

हालांकि इस विषय पर पिछले कई वर्षों से बहस चली आ रही है कि सेक्स एजुकेशन की जरूरत है भी या नहीं. अगर जरूरत है भी, तो इसकी शुरुआत किस उम्र से होनी चाहिए. इस पर सभी के अपने-अपने तर्क-वितर्क हैं और अपनी-अपनी जगह सब सही भी हैं. कुछ लोगों का मानना है कि सेक्स एजुकेशन का अभाव हमारे बच्चों के भविष्य पर गहरा असर डाल सकता है. लोगों का तर्क है कि इस तरह की शिक्षा का बच्चों और समाज पर  गलत असर होगा.

क्या यह सही नहीं है कि जहाँ शिक्षा का अभाव है वहां समस्याएं हैं? खासकर शिक्षा उस विषय पर जो हमारी जिंदगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. जिस विषय का हमारे स्वास्थ, सम्बन्ध या जिंदगी पर गहरा असर हो, उसे नज़रअंदाज़ करना कितना अनुचित होगा. सेक्स एजुकेशन से मुंह मोड़ते रहना कितना गलत होगा. जबकि आज-कल के बच्चों को टीवी, फ़िल्म या इंटरनेट के माध्यम से सेक्स से जुड़े विषय पर आधी-अधूरी व उत्तेजक जानकारियां ही मिलती है. किसी विषय पर आधी जानकारी होना कितना खतरनाक हो सकता है ये सभी को पता है. ये आधी-अधूरी जानकारियां उन्हें गुमराह करने के लिए काफी है.

शारीरिक बीमारियां

इस आधे ज्ञान की वजह से कुछ टीनएजर्स तो, बिना किसी सुरक्षा के शारीरिक संबंध भी स्थापित कर रहे हैं. जिसका उनके भविष्य पर बुरा असर हो सकता है. तरह-तरह की शारीरिक बीमारियां, मानसिक परेशानियां और पढ़ाई या करियर का नुक़सान. इससे बेहतर तो यही होगा कि इस विषय पर उनकी बढ़ती जिज्ञासाओं को समझते हुए, इस पर उन्हें पूर्ण जानकारी दी जाए. सेक्स एजुकेशन को भी उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए जितना बाकी सभी एजुकेशन को दिया जाता है.

सेक्स एजुकेशन की शुरुआत कब से और कैसे करें

अब सवाल उठता है सेक्स एजुकेशन की शुरुआत करें भी तो कैसे? ऐसे समाज में जहाँ सेक्स एजुकेशन न तो स्कूलों में दी जाती हैं और ना ही मेडिकल कॉलेज में. इन हालातो में बच्चों को कैसे मिल पाएगी सेक्स एजुकेशन? क्या इस विषय पर अभिभावकों को ही शुरुआत करनी होगी?  अगर सेक्स संबंधी अंधविश्वास, भ्रांतियां और इससे जुड़ी कई समस्यायों से अपने किशोरों को बचाना है तो इसकी शुरुआत अभिभावकों को ही करने होगी. अगर हम अपने टीनएजर्स को यौन शोषण जैसी घिनौनी घटनाओं से बचाना चाहते हैं तो सेक्स एजुकेशन दें या न दें, से परे हमें ये सोचना होगा कि कैसे और किस उम्र से बच्चों को सेक्स एजुकेशन दें.

“बहुत से माता-पिता मेरी इस बात पर बहुत हँसते हैं जब मैं कहती हूँ कि उन्हें सेक्स के बारे में अपने बच्चों के साथ शुरुआत से ही बातें करना, शुरू कर देना चाहिए” मेग हिकलिंग कहती हैं. मेग हिकलिंग एक सेक्सुअल हेल्थ एडुकेटर और दी न्यू स्पीकिंग ऑफ़ सेक्स : व्हाट योर चिल्ड्रन नीड टू नो एंड व्हेन दे नीड टू नो इट की लेखिका हैं. “लेकिन पेरेंट्स से ये भी सुनती हूँ कि वे नहीं चाहते कि उनके बच्चे सेक्सुअल सम्बन्धी बातें बाहर से सीख कर आएं या किसी मीडिया के माध्यम से सीखें”.

शुरुआत के चार वर्ष में सेक्स एजुकेशन

बच्चा जैसे-जैसे बढ़ता है, उसके अंदर कई सवाल आने लगते हैं. कई उत्सुकताएँ आने लगती है. वे जो कुछ भी देखते हैं, उन्हें जानना चाहते हैं. बातों ही बातों में हम उनके सभी अंगों का जिक्र कर चुके होते हैं. जैसे ‘बेटा ये मत छुओ, आपके हाँथ गंदे हो जाएंगे’. या ‘पैर हटा लो, बालों में हाथ मत डालो, नाक मत खुजाओ’.  इस तरह से बातों ही बातों में हम उनसे उनके सभी अंगों का जिक्र कर चुके होते हैं, सिर्फ उनके गुप्तांगों को छोड़कर.

अब देखिये हम क्या करते हैं, जब भी बच्चा अपने गुप्तांग में हाथ लगाता है. हम उसे मना करते हैं ‘बेटा मत छुओ, गन्दा है’. या अगर बच्चा नंगी अवस्था में किसी के सामने आता है तो हम उसे तुरंत पैंट पहना देते हैं या उसे झिड़क देते हैं. इस तरह से बच्चे के मन में उत्सुकता जागने लगती है और जब भी वह अकेला होता है अपने गुप्तांग को देखता है… छूता है… उनसे खेलता है और पेरेंट्स को पता भी नहीं लगता. धीरे-धीरे उन्हें अच्छा लगने लगता है और फिर वे इसके आदी हो जाते हैं.

सेक्स एजुकेशन की शुरुआत हमें अब कर लेनी चाहिए. उन्हें, उनके गुप्तांगों को छुपाना सिखाना चाहिए. क्यों छुपाना चाहिए, ये भी बताता चाहिए. उन्हें बतायें ‘बेटा इसे प्राइवेट पार्ट कहते हैं और इन्हें छुपाकर रखना चाहिए. इसे सभी लोग छुपाकर रखते हैं. आप भी इसे छुपाकर रखो. अपने प्राइवेट पार्ट को किसी को छूने मत देना. कोई छूता भी है तो आप हमें बताना’. इस तरह सेक्स एजुकेशन की शुरुआत करने से ही बच्चों के मन में गुप्तांगों को लेकर कोई सवाल भी नहीं रहेगा, और उन्हें हम बाल यौन शोषण से भी बचा सकेंगे.

5-6 वर्ष में सेक्स एजुकेशन

अभी तक बच्चे को आप खुद शौच करा रहे थे, उसे नहला रहे थे. अब वक्त आ चुका है जब आपको उनसे कहना चाहिए कि उनके प्राइवेट पार्ट अब आपको भी नहीं देखना चाहिए. इसलिए वो खुद ही शौच करना और नहाना सीखें. इस तरह से वे समझ पाएंगे कि उनके प्राइवेट पार्ट बिलकुल निजी है. ये किसी और के देखने या छूने की चीज नहीं है. सेक्स एजुकेशन का असर आपको खुद ही दिखने लगेगा .

सेक्स एजुकेशन 6-9 में

इस ऐज ग्रुप के बच्चे जीवन की सच्चाई के बारे में अपनी-अपनी जिज्ञासा रखते हैं. कुछ तो पूछने भी लगते हैं ‘बच्चे कहां से आते हैं’? यहाँ आपको जवाब देने में सतर्कता बरतनी चाहिए. उनके इस सवाल को टालें नहीं, और ना ही उन्हें बहलाने-फुसलाने वाले जवाब दें. उनके सवालों का उचित और सही जवाब दें. क्योंकि बच्चों को अपने पेरेंट्स पर अटूट विश्वास होता है. उन्हें उनके पेरेंट्स के द्वारा बताई गयी बातें ही सच लगती हैं.

ऐसे में जब बाद में उन्हें सच का पता लगेगा तो उनका अपने पेरेंट्स से विश्‍वास उठने लगेगा और उनकी बद्तमीज़ियों के रूप में उनका रिएक्शन पेरेंट्स को देखने को मिलेगा. इसलिए उनके किसी भी सवाल का जवाब बहुत संभल कर दें. सेक्स एजुकेशन को भी बाकी एजुकेशन की तरह इम्पोर्टेंस देते हुए ईमानदारी से सच बतायें.

9-12 का सेक्स एजुकेशन

इस ऐज ग्रुप के बच्चों को सेक्स एजुकेशन की सख्त जरूरत होती है. इस उम्र के बच्चों में मानसिक विकास के साथ शारीरिक विकास भी होने लगता हैं. जैसे माहवारी, गुप्तांगों में बालों का आना या स्तनों का उभरना. अपने शरीर के होते बदलावों के प्रति उन्हें जानने की उत्सुकता होती है. हमें बच्चों को इनके विषय में बताना चाहिए. शरीर में होते बदलावों के साथ उनमे सेक्स के प्रति इच्छा होने लगती है. उनमे इसे जानने की एक उत्सुकता होती है. उनके मनोभाव को समझते हुए उन्हें समझाएं कि ये सब कब और किस एज के बाद करना चाहिए.

उन्हें ये भी बतायें कि ये सब पहले करने के दुष्परिणाम क्या-क्या हो सकते हैं. सेक्स एजुकेशन के माध्यम से उन्हें अच्छे-बुरे का ज्ञान दें. सेक्स से होने वाली बीमारियोँ के बारे में भी जानकारी दें. बच्चों को सेक्स सम्बन्धी बातों का पता बाहर से चले, इससे पहले खुद ही बता दें तो बेहतर है.

12-18 का सेक्स एजुकेशन

इस उम्र में उन्हें इतनी सेक्स एजुकेशन मिल जानी चाहिए कि उन्हें अपने शरीर के बारे में संपूर्ण जानकारी हो. साथ ही अपोजिट सेक्स के बॉडी पार्ट्स की जानकारी भी पूरी तरह से हो ताकि वे लड़का-लड़की दोनों के ही साथ कंफ़र्टेबल होकर बातचीत व व्यवहार कर सकें. बदलते हॉरमोन्स की वजह से इस उम्र में सेक्स इच्छा का होना भी मामूली बात है. इसलिए सेक्स एजुकेशन के माध्यम से, सेक्स के बाद होने वाली परेशानियों या बीमारियों का जिक्र ज़रूर करें. उन्हें टीन प्रेगनेंसी और सेक्सुअली ट्रांसमीटेड डिज़ीज़ेस की जानकारी दें. साथ ही उनसे गर्भपात से होने वाली तकलीफ़ों के बारे में भी बात करें, ताकि बच्चे किसी बहकावे में न आ सके और इस तरह से गुमराह होने से भी बचे रहें.

 

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