हमने तरक्की बहुत कर ली और निरंतर करते जा रहे हैं… बस आगे की ओर हमारे कदम बढ़ते जा रहे हैं… जहाँ media इतनी advance हो गयी है, उतनी ही अपडेटेड हम होते जा रहे हैं… निरंतर नए-नए जानकारियों से हमारा ज्ञान बढ़ता जा रहा है… फिर भी पता नहीं क्यों, मेरी honesty मेरे reliable होने की मुझसे निशानी मांगती है. हर पल… हर लम्हा… मेरी honesty मुझ पर ठहाके लगाती है. मेरी खुद के प्रति reliable होने की बात पर मेरा मजाक उड़ाती है. जब सोचता हूँ, तब महसूस होता है कि सच ही तो है! कितने confused हैं हम!

Actually हम चाहते क्या हैं, यही clear नहीं कर पा रहें हैं.

मन कहता है कुछ… हम करते हैं कुछ…

देखते हैं कुछ… समझते हैं कुछ…

हमारी Honesty और reliable सही मायने में कितने honest हैं! इस विषय पर आगे जो बातें लिखी गयी है. शायद कुछ पल के लिए ही सही, आपकी आत्मा को बेचैन करने वाली है.

पहले दो बातें आपको ध्यान दिला दूँ – “झूठ बोलना पाप है” और “हमाम में सब नंगे हैं

झूठ बोलना पाप है” यह line है, जिसे सुन-सुन कर हम सब बचपन से बड़े होते हैं.

हमाम में सब नंगे हैं” ये लाइन बड़े होने के बाद सुनने को मिलती है और हमारी समझ भी आती है. अब जिनके समझ में नहीं आती, उन्हें जरा details में बता दूँ कि कपडे के नीचे हम सब नंगे हैं. नंगापन ही हमारी सच्चाई है. क्योंकि हम कपडे पहनकर पैदा नहीं होते हैं. बनावटी कपड़ों से अपनी सच्चाई को हम ढके होते हैं. जिसके बदन पर छोटे कपडे होते हैं उन्हें हम कुछ अलग निगाह से देखते हैं. उनके लिए सम्बोधन कुछ और अभद्र शब्दों से किये जाते हैं. जो लोग अपने पूरे तन को कपड़ों से ढके होते हैं. यानी हमारे शरीर का जितना हिस्सा कपड़ों में ढका है, हम उतने ही धार्मिक और सभ्य माने जाते हैं.

एक बात बिलकुल अटपटा है कि हम अपने शरीर रुपी hardware को जब कपड़ों में छुपा कर रखते हैं. तो इस hardware से जो output हमारे शब्दों के रूप में निकलते हैं. वो भला पूरी तरह खुली हुई हो या पूरी तरह सत्य हो, ये कैसे उम्मीद करें? दिमाग रुपी processing system जब हमारे शरीर रूपी hardware को ढके रखने का निर्देश दे, वहां उसी processing system से कैसे एक reliable शब्द रुपी output की उम्मीद कर सकते हैं!

हम ऐसे कई लोगों को जानते होंगे, जिन्हे लोग मुंहफट कहते है. यानी उसके दिल में जो आता है, बस कह देता है बगैर कुछ सोचे समझे. हम वैसे इंसान के लिए कह देते हैं “अरे वो पागल है, जो मन में आता है बकता रहता है”.

अब देखिये जिस इंसान ने बिना कुछ सोचे समझे या इस बात का परवाह किये बगैर कि उसकी बात से सामने वाला उससे नाराज़ होगा या खुश होगा, जो सच होता है या उसे जो सच लगता है. वो कह देता है. फिर हम वैसे इंसान को पागल की उपाधि दे देते हैं. कितने सच्चाई प्रेमी हैं हम!

दूसरी तरफ वो लोग होते हैं, जो कुछ भी कहने से पहले. यानी कोई भी output देने से पहले, उनका processing system अपने logical capacity से यह हिसाब लगाता है कि जो output दिए जाएंगे, वह किसके लिए है और इस output का सामने वाले की भावनाओ पर क्या असर होगा? उसे ये बात पसंद आएगी भी या नहीं? अगर नहीं पसंद आयी तो इसका परिणाम क्या होगा? ऐसे कई factors होते हैं जिनका हिसाब-किताब लगाने के बाद ही output निकाले जाते हैं. ऐसे लोगों को हम सम्मानिये और बुद्धिमान या ये कहिये पूरी तरह ईमानदार मानते हैं.

पर सच का क्या ?

सच तो processing system  में ही रह गए! और जो बोला गया वो महज़ एक planned convincing words हैं. अंदर से तो polished words निकले हैं, real words क्या है, हम कहाँ देख पाते ऐसे में!

दूसरी output ले लीजिये चेहरे के भाव, यानि face expression. यहाँ मन में भाव होता है कुछ, हम दिखाते हैं कुछ. “Honesty is the best policy” को हम ideal policy के रूप में लेकर चलते हैं. कितना अच्छा लगता है कहने– सुनने में ये “Honesty is the best policy”. है न! मुस्कुराता चेहरा हो तो फिर क्या कहने. मुस्कुराता हुआ नूरानी चेहरा भला किसे पसंद नहीं! और फिर कामयाबी या professional life के लिए मुस्कुराना तो एक गुरु मंत्र जैसा है. भले ही मन में सामने वाले के लिए घृणा और नफरत की ज्वाला भड़क रहे हो पर दिखना कुछ और ही चाहिए, है न!

पर सच का क्या ? अब ऐसे में honesty का हमारे खुद से ही reliable होने पर सवाल है तो क्या बुरा है?

आप तर्क दे सकते हैं कि कुछ सच को छुपाये रखना ही बुद्धिमानी है, मानवता का कल्याण के लिए अगर सच को छुपाने की जरूरत है तो छुपाना ही चाहिए, क्योंकि कुछ सच विनाशक भी हो सकते हैं. बिलकुल सहमत हूँ आपसे. मैं भी ऐसा मानता हूँ. तो फिर किसी के एक झूठ को लेकर बवाल भी खड़े नहीं करने चाहिए न! हम ये क्यों नहीं मान लेते कि ज़िन्दगी में झूठ का उतना ही स्थान है जितना सच का. या फिर यह भी कह सकते हैं कि “जिस झूठ से किसी का भला हो, वह झूठ कई सच से बढ़कर होता है”.

अब आइये लौटते हैं शरीर को ढकने की बात पर. तो honestly मैं बता दूँ, शरीर के ढकने से मेरा कोई विरोध नहीं है. हानिकारक धुल-मिटटी, शरद-गरम, कीड़े-मकोड़े से बचने के लिए शरीर को ढकना जरूरी है. मुझे अटपटा ये लगता है कि किसी के छोटे कपड़ों पे लोग तंज कसते हैं. क्या हक़ बनता है किसी को, किसी की personal freedom पर अपनी मर्जी थोपे! अब कुछ लोगों का यह भी तर्क हो सकता है कि शरीर का दूसरा नाम लज्जा है, और लज्जा लाज में यानी ढकी ही रहे तो अच्छा लगता है. बिल्कुल सत्य, कुछ private parts हमारे शरीर के हैं जिन्हे private ही रखने चाहिए. और उन्हें private रखने के लिए उनका ढका होना जरूरी है. लेकिन अपने private parts का प्रदर्शन करता ही कौन है ! जो लोग बिल्कुल  honestly अपने private parts का प्रदर्शन करते हैं. उन्हें तो हम celebrity बना देते हैं! एक तरफ private parts के प्रदर्शन को हम मनोरंजन के रूप में लेते हैं. वही दूसरी तरफ संस्कारों का रोना. ये हमारे confused होने की निशानी नहीं तो और क्या है ? सोचियेगा जरूर.

Advertisements

इस विषय पर हमारी कोशिश कैसी लगी आपको ? अगर पसंद आयी तो अपने दोस्तों से भी इसे share करें. आपको लगता है कि इस विषय पर कुछ और जुड़ना चाहिए तो ज़रूर बताएं… इस पोस्ट के पढ़ने वाले सभी लोगों को इस विषय पर आप भी कुछ कहें. हो सकता है आपके Comment से किसी का भला हो जाए… और हाँ हमारे Facebook पेज को Like करना ना भूलें. आप देखना आपके खूबसूरत Love Life के लिए हम Lucky Charm साबित होंगे. Wish U happy life… 🙂