Puzzled ज़िन्दगी की Puzzled दुनिया

आज जो मैं लिखने जा रहा हूँ, वह बहुत से लोगों को पसंद नहीं आएगा. मेरे इस पोस्ट पर बहुत से लोगों को नाराज़गी भी हो सकती है. इस पोस्ट को पढ़ने के बाद कुछ लोग मुझे अधर्मी… नास्तिक… चरित्रहीन जैसा ही समझने वाले हैं. इस पोस्ट से खासकर पंडितों, मौलवियों या पादरियों को अधिक कष्ट पहुँच सकता है. इस पोस्ट पर नाराज़गी उन्हें भी हो सकती है जिनके मासूम मन पर इन पंडितों, मौलवियों या पादरियों का कुछ अधिक असर रहा है, लेकिन फिर भी यह पोस्ट लिखने को मजबूर हूँ. मन के अंदर उबलते मेरे विचारों को आप तक पहुँचाने के लिए व्याकुल हूँ. नहीं रहा जा रहा है लिखे बगैर.

आगे कुछ लिखने से पहले ही आपको बता दूँ कि अपने इस पोस्ट के माध्यम से हम किसी की भावनाओं को आहात नहीं करना चाहते हैं. हो सकता है मेरे विचारों से आप भी सहमत हों, हो सकता ना भी हो. जो सहमत नहीं होंगे उन्हें मैं सहमति के लिए आग्रह भी नहीं कर सकता, फिर भी इतना ज़रूर कहूंगा कि हम lovetrainings.com वाले नफरत से घृणा करते हैं. विश्वास कीजिये हमें नफरत और ज़हर दोनों एक से लगते हैं. अगर कोई फ़र्क़ है तो बस इतना कि ज़हर जान ले लेता है और नफरत ज़िन्दगी ले लेता है. ये और बात है कि जिनकी किस्मत में सिर्फ नफरत ही है उन्हें जीना पड़ता है क्योंकि उनकी साँसें चल रही होती हैं. खैर इस विषय पर फिर कभी, क्योंकि आज का विषय दूसरा है.

अब आज के विषय पर आते है, तो विषय यह है कि ये धर्म किसने बनाया और क्यों बनाया ? बनाया भी तो इसके टुकड़े क्यों कर दिए? धर्म के जो टुकड़े किये गए हैं वो प्यार से किये गए थे या नफरत से, क्योंकि बटवारा प्यार से भी होता है और नफरत से भी. ये बात और कि जहाँ बात बॅटवारे की आती है तो जहाँ बॅटवारा है वहाँ नफरत ना हो, ऐसा मुमकिन ही नहीं क्योंकि प्यार बांटता नहीं बल्कि बंटे हुए को जोड़ता है. जुड़े हुए को सींचता है. इन बातों से तो यही लगता है कि धर्म को बांटने वाले लोगों में कुछ न कुछ स्वार्थ की भावना या एक दूसरे के प्रति नफरत ज़रूर रही होगी, ऐसा मेरा अनुमान है.

कहानी है या हक़ीक़त ये तो पता नहीं पर लोगों से यही सुनता आया हूँ कि धरती पर सबसे पहले सिर्फ दो मानव का आगमन हुआ था. जिन्हें हम आदम और हौआ के नाम से जानते है. आदम पुरुष था और हौआ स्त्री थी. इनका धर्म क्या था यह आज तक नहीं जाना जा सका. कोई धर्म था भी इनका या नहीं, यह भी नहीं पता. जानने की काफी कोशिश की, पर जान न पाए. मेरे इस सवाल का जवाब लगभग सभी के पास था लेकिन उनके जवाब से मुझे संतुष्टि नहीं मिली. आदत से मज़बूर हूँ, जब तक किसी बात पर दिल की सहमति नहीं होती, मेरा दिमाग उस बात को स्वीकार ही नहीं करता. यही वजह है कि मेरा सवाल आज भी यही है कि आदम और हौआ के क्या धर्म था.

अगर उनका कोई धर्म नहीं था तो फिर ये धर्म वाले लोग किधर से आ गए ? इस बात का जवाब तो मेरा दिल भी देता है और दिमाग की भी सहमति इसमें है कि जहाँ तक मैं जान सका हूँ या समझ सका हूँ धर्म से लोगों का अभिप्राय विभाग के रूप में रहा होगा. आदम और हौआ की ही संतान है हम सब. हमारी संख्या बढ़ती गयी… बढ़ती गयी… बढ़ते-बढ़ते विस्तार हो गयी… भीड़ हो गयी. जब सिर्फ दो इंसान एक विशाल भीड़ में बदल गए तो इस भीड़ को नियंत्रण करने के लिए लोगों ने कुछ विभाग बाँट दिए. सभी विभागों के रास्ते लगभग अलग-अलग दिशाओं में कर दिए गए… दिशाएँ अलग-अलग क्यों की गई यह भी समझ आता है. सभी धर्मों के अलग-अलग दिशाओं में होने के पीछे आपसी प्यार तो हो नहीं सकता. उन्हें आपस में अगर प्यार होता तो उनकी दिशाओं का निर्धारण सिर्फ एक ही दिशा होती. जो भी दिशा होती सभी धर्मों की एक ही दिशा होती.

इस सवाल को मैंने कई ज्ञानियों से पूछा भी, कि इंसानों को धर्म में बांटना उनकी मजबूरी थी तो जवाब मिला की ऐसा किया गया क्योंकि भीड़ को नियंत्रण करने के लिए उन्हें विभागों में बांटना भी ज़रूरी था. लेकिन इन विभागों के या धर्मों की अलग-अलग दिशा क्यों निर्धारित की गई ?

इस सवाल का जवाब जब भी मुझे मिलता मुझे ऐसा महसूस होता था कि मुझे किसी धर्म की जानकारी नहीं दी जा रही है, बल्कि किसी प्रोडक्ट की जानकारी दी जा रही है. उसके फायदे गिनाए जा रहे हैं. उसके फीचर्स समझाए जा रहे हैं. एक ऐसे प्रोडक्ट की जानकारी दी जा रही है जिसमें ज़ीरो परसेंट डिफेक्ट हो. मुझे ऐसा लगता है जैसे धर्म की जानकारी मैंने किसी ज्ञानी से नहीं बल्कि उस धर्म के एजेंट से ली हो और मैंने उसके प्रोडक्ट पर सवाल कर दिया हो और वह दूसरे प्रोडक्ट यानी दूसरे धर्म को गलत साबित करने पर तुला हुआ है.

मैंने हर प्रोडक्ट… माफ़ कीजिये… हर धर्म के ज्ञानियों में मुझे एक एजेंट ही नज़र आया. मैं उन्हें ज्ञानी तो बिल्कुल भी नहीं मान सकता क्योंकि ज्ञानी को पता है कि हम सब एक है. उसी आदम और हौआ की संतान है. ज्ञानी जानता है कि ये धर्म या ये धर्मों के नामकरण इंसानों ने अपनी अपनी सुविधा के अनुसार बना लिए हैं. भीड़ के जब टुकड़े किये गए थे तो उन टुकड़ों में कोई बड़ा हिस्सा था कोई छोटा और कोई-कोई तो बिल्कुल ही छोटा.

दुनिया में शायद नफरत की सबसे बड़ी वजह यह बटवारा ही रहा है ऐसा मेरा व्यक्तिगत मानना है. मुझे गलत ठहराने वालों का यह भी तर्क हो सकता है कि मानव की प्रगति के लिए इंसानों का बाँटना ज़रूरी था. कुछ लोगों का यह भी तर्क हो सकता है कि इंसानों का विभिन्न दिशाओं में जाना ही ज़िन्दगी है, अपने तर्क को सही ठहराने के लिए चिड़ियों के घोसलों का उदहारण भी दिया जा सकता है. चिड़ियाँ भी अंडे देती हैं. अंडे चूज़े बनते हैं और यही चूज़े फिर चिड़ियाँ बन जाते हैं. पंख वाली चिड़ियाँ अपनी-अपनी जीविका की व्यवस्था में अपनी अलग-अलग दिशाएँ चुनती रहती हैं. विभागों के बटवारे पर यानी धर्मों के बटवारे पर कुछ लोगों का यह भी तर्क हो सकता है कि जब विभाग अलग-अलग हैं तो उनके रूल्स एक कैसे हो सकते हैं.

हर विभाग का अपना-अपना विषय है. जब विषय अलग है तो दिशाएँ भी विषयों के अनुसार ही होंगी. चलिए मान लिया. विभाग अलग हैं तो दिशाएँ भी अलग ही होंगी. फिर लोग ऐसा क्यों कहते हैं कि हमारी दिशा सही हैं और उनकी गलत. लोग क्यों कहते हैं कि हमारा विषय ही सबसे बेहतर विषय हैं क्योंकि बाकी सभी विभागों यानी धर्मों के विषयों में त्रुटियाँ हैं या दुष्प्रचार हैं.

चलिए यह भी ठीक हैं कि उनमे त्रुटियाँ हैं या उनकी दिशाएँ गलत हैं… माफ़ करें लेकिन मुझे नहीं लगता कि आप जानबूझकर कभी गलत दिशा में जाना चाहेंगे. अगर आप गलत दिशा में जा रहे हैं या आपके सब्जेक्ट्स में त्रुटियाँ हैं तो इसकी वजह सिर्फ ज्ञान की कमी हो सकती हैं. कोई भी इंसान जानबूझ कर कुएँ में नहीं गिरना चाहता. कुएँ में गिरने की वजह अन्धकार ही हो सकता हैं. अगर आप नज़र वाले हैं या थे, आपको अगर ऐसा लग रहा था कि दूसरे धर्म के लोग गलत दिशा में जा रहे हैं तो आपने तो रोका होता उन्हें. आपने क्यों नहीं समझाया कभी कि उनकी दिशा गलत है तो क्यों हैं. अन्धकार की वजह से जब वे कुएँ की तरफ बढ़ रहे थे क्यों नहीं रोका आपने कभी. आप तो जानते थे कि उधर कुआँ हैं. आपको पता था कि उनकी दिशा कुएँ की तरफ हैं… उनका कुएँ में गिरना तय है… आपको पता था कि आप रोक सकते हैं उन्हें… कुएँ में गिरने से बचाने के लिए आप उन्हें कह सकते थे कि उधर कुआँ हैं. शायद वे आपकी बात मान लेते और रुक जाते. वे विचार करते अपनी उचित दिशा पर. तलाश करते अपनी नयी दिशा को.

आपने ऐसा किया होता तो आपको यह शिकायत नहीं होती कि उनकी दिशा गलत हैं क्योंकि वे सही दिशा पर होते. अगर उनकी दिशा गलत है तो इसकी वजह कहीं न कहीं आप भी हैं. शायद आप चाहते ही नहीं थे कि वे सही दिशा पर जाएँ. कुएँ की तरफ उनके बढ़ते क़दमों को आपने इसलिए नहीं रोका क्योंकि आप चाहते थे कि वे उस कुएँ में गिर जाएँ. आप चाहते थे कि उस विभाग का अस्तित्व ही विलीन हो जाए. बिल्कुल यही हैं सच. अगर यह सच नहीं है तो फिर आपने उन्हें रोका क्यों नहीं ? अगर आपने रोका भी है और उन्होंने आपकी बात नहीं मानी, आपका तिरस्कार कर दिया होगा उन्होंने. आपके सुझाव को नज़रअंदाज़ करते हुए आगे बढ़ते गए सभी. क्या उस लम्बे कारवाँ में किसी ने आपकी बात नहीं मानीं ? क्या इतना अविश्वास रहा हैं एक-दूसरे के प्रति कि अच्छी बात भी बुरी लगती थी. अगर ऐसी बात हैं तब तो धर्मों के बटवारे से भीड़ ही अच्छी थी.

Advertisements

इस विषय पर हमारी कोशिश कैसी लगी आपको ? अगर पसंद आयी तो अपने दोस्तों से भी इसे share करें. आपको लगता है कि इस विषय पर कुछ और जुड़ना चाहिए तो ज़रूर बताएं… इस पोस्ट के पढ़ने वाले सभी लोगों को इस विषय पर आप भी कुछ कहें. हो सकता है आपके Comment से किसी का भला हो जाए… और हाँ हमारे Facebook पेज को Like करना ना भूलें. आप देखना आपके खूबसूरत Love Life के लिए हम Lucky Charm साबित होंगे. Wish U happy life… 🙂